Article summary
Abstract
इक्कीसवीं सदी में उच्च शिक्षा प्रणालियाँ वैश्वीकरण, गुणवत्ता आश्वासन, पारदर्शिता तथा नवाचार की बढ़ती अपेक्षाओं के कारण तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही हैं। भारतीय उच्च शिक्षा शासन प्रणाली, यद्यपि विश्व की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है, फिर भी यह खंडित नियामक संरचना, गुणवत्ता में असमानता तथा सीमित संस्थागत स्वायत्तता जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इस संदर्भ में भारत सरकार का नवीनतम “विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025” उच्च शिक्षा प्रणाली में एक व्यापक संरचनात्मक एवं वैचारिक परिवर्तन का प्रस्ताव प्रस्तुत कर रहा है। यह विधेयक उच्च शिक्षा के नियमन, प्रत्यायन तथा मानकीकरण के कार्यों को पृथक संस्थागत निकायों नियामक परिषद, गुणवत्ता परिषद एवं मानक परिषद के माध्यम से संचालित करने का प्रावधान करता है, जिससे शासन प्रणाली में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व एवं कार्य-कुशलता को सुदृढ़ किया जा सके। साथ ही, यह विधेयक परिणाम-आधारित शिक्षा, संस्थागत स्वायत्तता तथा बहुविषयक विकास को प्रोत्साहित करते हुए उच्च शिक्षा को अधिक लचीला एवं नवाचारी बनाने का प्रयास करता है। प्रस्तुत शोध-पत्र एक कॉन्सेप्चुअल अध्ययन है, जिसका उद्देश्य इस विधेयक के वैचारिक आधार, शासन संरचना तथा संभावित शैक्षिक एवं नीतिगत प्रभावों का समालोचनात्मक विश्लेषण करना है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि यह विधेयक पारंपरिक केंद्रीकृत एवं खंडित नियामक ढाँचे से हटकर एक समेकित, बहु-स्तरीय एवं कार्य-विभाजित शासन मॉडल की स्थापना का प्रयास करता है। हालाँकि, इसके प्रभावी क्रियान्वयन में केंद्रीकरण की संभावना, संस्थागत तैयारी की कमी तथा नियमन और स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाए रखने जैसी चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। निष्कर्षतः, यदि इस विधेयक को संतुलित एवं संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ लागू किया जाए, तो यह भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी एवं वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
