Article summary
Abstract
सृष्टि के आरंभ से ही सृष्टि की रचना और विकास में नारी की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सृष्टि के दो मूलभूत तत्व हैं नर और नारी। दोनों के सहयोग एवं समन्वय से ही सृष्टि की रचना होती है, मगर इसमें नारी की भूमिका पुरुष से अधिक है, कारण यह है कि नारी सृजन के साथ पालन-पोषण की शक्ति भी रखती है। वास्तव में नारी सृष्टि का मूलाधार है, समाज में भी स्त्री और पुरुष का समान अस्तित्व है, एक के बिना दूसरे का अस्तित्व डगमगाने लगता है। संसार रूपी रथ के दो पहिये के समान नर और नारी होते हैं, किसी एक पहिये के न होने से दूसरा पहिया भी अवरूद्ध हो जाता है। इसी कारण नारी और पुरुष को समान मानना ही उचित होगा। मगर हमारा समाज पुरूष प्रधान है, जहाँ पुरुष का स्थान नारी से ऊँचा ही रहा है, इतना ही नहीं सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था पुरुर्षों के द्वारा बनाये जाने के कारण नारी की स्थिति गौण ही रहती है। आदिकाल से आज तक नारी जीवन में उन्नति एवं अधोगति का साक्ष्य मिलता है। भारतीय समाज में नारी को देवी, पतिव्रता एवं गृहस्वामिनी मानकर उसका मनमाना शोषण भी हुआ है। “नारी को देवी दर्जा तो दिया गया, मगर उसके साथ मनुष्यता का व्यवहार कम किया गया। स्त्री की स्तुति के श्लोक व स्रोत तो बहुत लिखे गये परन्तु उनके शोषण, संघर्ष और उत्पीड़न की गाथाओं का चित्रण नहीं किया गया।“1 शास्त्रों में भी नारी के प्रति दृष्टिकोण सही नहीं था। इससे स्पष्ट है नारी का जीवन विडंबनाओं से पूर्ण है, भारतीय नारी के जीवन से अवगत होने के लिए आदिम काल, महाकाव्य काल, बौद्धकाल, जैन धर्मकाल, मध्यकाल, आधुनिक काल का अध्ययन अपेक्षित है। नवयुगीन समाज में औद्योगीकरण से रोजगार के अवसर उपलब्ध होने से नारी पूँजीवाद का एक हिस्सा बन गई। पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर उत्पादन के क्षेत्र में महŸवपूर्ण भूमिका निभा रही है। उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग एवं निम्न वर्ग की कामकाजी औरतें आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने का प्रयास करती दिखती है। शोभा नाटाणी लिखती हैं कि “19वीं और 20वीं शताब्दी में स्त्रियों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। जैसे-जैसे स्त्रियों में साक्षरता का प्रसार होगा औद्योगीकरण और नगरीकरण की प्रक्रिया तेज होगी उसके साथ-साथ स्त्रियों की स्थिति में भी अवश्य सुधार आयेगा, आज स्त्रियों में सामाजिक चेतना बढ़ती जा रही है।
